भारत के जिस बासमती चावल की दीवानी है दुनिया उसके निर्यात पर लगा ‘ग्रहण’, ईरान युद्ध के कारण आई ये मुसीबत

ईरान-इजराइल युद्ध के कारण भारत के बासमती चावल निर्यात पर गहरा संकट मंडरा रहा है। करीब 4 लाख मीट्रिक टन चावल बंदरगाहों पर अटका या ट्रांजिट में फंसा है, नए सौदे ठप हो गए हैं, मालभाड़ा दोगुना से ज्यादा बढ़ गया है, और बासमती के दामों में 4-5 रुपये प्रति किलो की गिरावट आई है। ईरान भारत का प्रमुख बाजार होने से पंजाब-हरियाणा के किसानों और निर्यातकों को भारी नुकसान का खतरा है।

ईरान युद्ध से बासमती निर्यात पर ग्रहण

ईरान-इजराइल संघर्ष के तेज होने से मिडिल ईस्ट में शिपिंग रूट्स बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। अमेरिका और इजराइल के हमलों के बाद हॉर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही जोखिम भरी हो गई है, जिससे भारत का बासमती चावल निर्यात ठप्प-सा हो गया है।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा बासमती चावल निर्यातक है। वित्त वर्ष 2024-25 में कुल 60.65 लाख टन बासमती निर्यात हुआ, जिसकी कीमत करीब 50,312 करोड़ रुपये थी। इसमें से लगभग 50-70% निर्यात मिडिल ईस्ट के देशों को जाता है, जिसमें सऊदी अरब, ईरान, इराक, यूएई और यमन प्रमुख हैं। इनमें ईरान दूसरा सबसे बड़ा बाजार है।

2025 में ईरान को भारत से करीब 1 मिलियन टन (लगभग 10 लाख टन) बासमती निर्यात हुआ, जिसकी वैल्यू 1.2 बिलियन डॉलर (करीब 10,000 करोड़ रुपये से ज्यादा) थी। कुछ आंकड़ों के अनुसार अप्रैल-दिसंबर 2025 में ईरान को 6.81 लाख टन बासमती भेजा गया। कुल बासमती निर्यात का 25% हिस्सा ईरान जाता है, जबकि इराक को 20%।

युद्ध शुरू होने के बाद स्थिति बिगड़ गई। ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अनुसार करीब 4 लाख मीट्रिक टन बासमती चावल प्रभावित हुआ है। इसमें 2 लाख टन भारतीय बंदरगाहों पर अटका है और 2 लाख टन ट्रांजिट में फंसा हुआ है। ईरान के सबसे बड़े बंदरगाह बंदर अब्बास के रास्ते अफगानिस्तान जाने वाली खेप भी रुक गई है।

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निर्यातकों को अब नए सौदे करने में हिचकिचाहट है। मालभाड़ा दोगुना से ज्यादा बढ़ गया है, बीमा लागत आसमान छू रही है, और पेमेंट में देरी का खतरा मंडरा रहा है। CIF (कॉस्ट, इंश्योरेंस, फ्रेट) आधारित अनुबंधों से बचने की सलाह दी जा रही है, FOB शर्तों पर ही सौदे करने को कहा जा रहा है ताकि जोखिम खरीदार पर रहे।

बासमती के दामों पर भी असर दिख रहा है। संघर्ष शुरू होने के एक दिन में ही दाम 4-5 रुपये प्रति किलो गिर गए, जो प्रति क्विंटल 400-500 रुपये का नुकसान है। यह गिरावट पंजाब और हरियाणा के किसानों तक पहुंच सकती है, जहां बासमती की खेती बड़े पैमाने पर होती है। हरियाणा अकेले कुल बासमती निर्यात में 35% योगदान देता है।

यह समय निर्यातकों के लिए सबसे खराब है क्योंकि रमजान के मौसम में गल्फ देशों में बासमती की मांग चरम पर होती है। अप्रैल 2025 से जनवरी 2026 तक गल्फ को निर्यात बढ़कर 3.75 मिलियन टन पहुंचा था, और फरवरी में 4 मिलियन टन का अनुमान था। लेकिन अब शिपमेंट रुकने से स्टोरेज और हैंडलिंग खर्च बढ़ रहा है।

यदि युद्ध लंबा खिंचा तो स्थिति और बिगड़ सकती है। ईरान के अलावा इराक और अन्य देशों के रूट भी प्रभावित हो सकते हैं। कुल मिलाकर मिडिल ईस्ट में बासमती का 4-4.2 मिलियन टन निर्यात जोखिम में है। निर्यातक और किसान दोनों ही अनिश्चितता से जूझ रहे हैं, और सरकार से जल्द हस्तक्षेप की मांग उठ रही है।

डिस्क्लेमर: यह खबर विभिन्न उपलब्ध जानकारियों पर आधारित है। बाजार की स्थिति तेजी से बदल सकती है।

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