“क्रेडिट कार्ड होल्डर की मौत के बाद बकाया राशि की जिम्मेदारी मृतक की संपत्ति (एस्टेट) पर होती है। परिवार या कानूनी वारिस अपनी निजी जेब से भुगतान के लिए बाध्य नहीं होते, सिवाय इसके कि वे सह-आवेदक या गारंटर हों। बैंक केवल मृतक की छोड़ी गई संपत्ति, बैंक बैलेंस, निवेश या प्रॉपर्टी से वसूली कर सकता है। यदि संपत्ति अपर्याप्त हो तो बाकी राशि बैंक को राइट-ऑफ करनी पड़ती है। कई प्रीमियम क्रेडिट कार्ड्स में डेथ कवर इंश्योरेंस भी उपलब्ध होता है जो बकाया को क्लियर कर सकता है।”
क्रेडिट कार्ड होल्डर की मौत पर बकाया भुगतान: RBI नियम और वास्तविक स्थिति
क्रेडिट कार्ड एक अनसिक्योर्ड लोन की श्रेणी में आता है, यानी इसके पीछे कोई संपत्ति गिरवी नहीं रखी जाती। इसलिए कार्डधारक की मौत के बाद बैंक परिवार के सदस्यों को उनकी व्यक्तिगत कमाई, बचत या संपत्ति से बकाया चुकाने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की गाइडलाइंस स्पष्ट रूप से कहती हैं कि वसूली केवल मृतक की एस्टेट से हो सकती है।
बैंक की वसूली प्रक्रिया इस प्रकार चलती है:
सबसे पहले मृतक के नाम पर मौजूद बैंक अकाउंट बैलेंस, फिक्स्ड डिपॉजिट, म्यूचुअल फंड, शेयर, प्रॉपर्टी, सोना या अन्य निवेश से बकाया राशि एडजस्ट की जाती है।
यदि एस्टेट की वैल्यू बकाया से ज्यादा है, तो बाकी राशि वारिसों को मिलती है।
यदि एस्टेट की वैल्यू कम है, जैसे बकाया 5 लाख रुपये है और संपत्ति केवल 2 लाख की है, तो बैंक 2 लाख वसूल कर सकता है और बाकी 3 लाख को बैड डेब्ट या एनपीए के रूप में राइट-ऑफ कर देता है।
यदि मृतक के नाम कोई संपत्ति या बैलेंस नहीं है, तो बैंक के पास कोई वसूली का रास्ता नहीं बचता और पूरा बकाया माफ हो जाता है।
कानूनी वारिसों की जिम्मेदारी सीमित होती है। भारतीय सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 50(2) के अनुसार, वारिस केवल उतनी ही राशि के लिए जिम्मेदार होते हैं जितनी संपत्ति उन्हें विरासत में मिलती है। उनकी व्यक्तिगत संपत्ति या आय पर कोई दावा नहीं किया जा सकता।
विशेष मामलों में जिम्मेदारी
कुछ स्थितियों में जिम्मेदारी अलग हो सकती है:
सह-आवेदक या को-साइनर : यदि क्रेडिट कार्ड जॉइंट अकाउंट है या किसी ने को-साइन किया है, तो जीवित पार्टनर पर पूरा बकाया चुकाने की जिम्मेदारी आ जाती है।
ऑथराइज्ड यूजर : एड-ऑन कार्ड यूजर पर कोई व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं होती, प्राइमरी होल्डर की ही रहती है।
इंश्योरेंस कवर : कई प्रीमियम क्रेडिट कार्ड्स जैसे HDFC Infinia, SBI Aurum, Axis Magnus आदि में डेथ बेनिफिट या क्रेडिट शील्ड इंश्योरेंस शामिल होता है। कार्डधारक की मौत पर बकाया राशि इंश्योरेंस कंपनी से क्लियर हो सकती है, जिससे परिवार पर कोई बोझ नहीं पड़ता।
रिकवरी एजेंट्स का व्यवहार : बैंक या उसके एजेंट परिवार को धमकी नहीं दे सकते या परेशान नहीं कर सकते। यदि ऐसा होता है, तो पुलिस में शिकायत या RBI बैंकिंग ओम्बड्समैन से संपर्क किया जा सकता है। RBI की कोड ऑफ कंडक्ट के अनुसार रिकवरी एजेंट्स को 8 AM से 7 PM के बीच ही संपर्क करना होता है और कोई उत्पीड़न नहीं करना चाहिए।
परिवार को क्या करना चाहिए
मौत के बाद तुरंत निम्न कदम उठाएं:
डेथ सर्टिफिकेट प्राप्त करें।
बैंक को सूचित करें और क्रेडिट कार्ड अकाउंट बंद करने की प्रक्रिया शुरू करें।
यदि संपत्ति है, तो सक्सेशन सर्टिफिकेट या लीगल हेयर प्रमाणपत्र के माध्यम से क्लेम सेटलमेंट करें।
यदि इंश्योरेंस कवर है, तो क्लेम फाइल करें।
ये नियम परिवार को अनावश्यक तनाव से बचाते हैं। क्रेडिट कार्ड का बकाया मृतक की जिम्मेदारी रहता है और मौत के बाद यह एस्टेट से ही सेटल होता है, न कि परिवार की व्यक्तिगत जेब से।
Disclaimer: यह एक सामान्य सूचना आधारित रिपोर्ट है। व्यक्तिगत मामलों में कानूनी सलाह लें।