आर्थिक सर्वे 2025-26 में गिग इकोनॉमी की सच्चाई उजागर हुई है, जहां 40% गिग वर्कर्स 15,000 रुपये से कम कमाते हैं। Swiggy और Zomato जैसे प्लेटफॉर्म्स के 25,000 रुपये मासिक कमाई के दावों की पोल खुली, क्योंकि वास्तविक आय अस्थिर है और 10 घंटे प्रतिदिन काम करने पर भी नेट इनकम 21,000 रुपये तक सीमित रहती है। सर्वे में न्यूनतम प्रति घंटा या प्रति टास्क वेज की सिफारिश की गई है, साथ ही अल्गोरिदमिक बायस और बर्नआउट के जोखिमों पर जोर दिया गया है।
आर्थिक सर्वे 2025-26 ने भारत की गिग इकोनॉमी में डिलिवरी वर्कर्स की आय पर गंभीर सवाल उठाए हैं, जहां Swiggy और Zomato जैसे प्लेटफॉर्म्स द्वारा किए जाने वाले 25,000 रुपये मासिक कमाई के दावे हकीकत से मेल नहीं खाते। सर्वे के आंकड़ों से पता चलता है कि गिग वर्कर्स की संख्या FY21 में 77 लाख से बढ़कर FY25 में 1.2 करोड़ हो गई है, जो कुल वर्कफोर्स का 2% से अधिक है, लेकिन इनमें से 40% वर्कर्स 15,000 रुपये से कम कमाते हैं। यह आय अस्थिरता प्लेटफॉर्म्स की अल्गोरिदमिक नीतियों से जुड़ी है, जो ऑर्डर असाइनमेंट में बायस पैदा करती हैं और वेटिंग टाइम को अनदेखा करती हैं।
Zomato के CEO ने दावा किया कि 2025 में डिलिवरी पार्टनर्स की औसत प्रति घंटा कमाई (टिप्स को छोड़कर) 102 रुपये है, जो 2024 के 92 रुपये से 10.9% अधिक है। लेकिन अगर कोई पार्टनर 10 घंटे प्रतिदिन और 26 दिन महीने काम करे, तो ग्रॉस इनकम 26,500 रुपये होती है, जिसमें से फ्यूल और मेंटेनेंस (20% अनुमानित) काटने के बाद नेट 21,000 रुपये बचते हैं। वहीं, Swiggy के आंकड़े भी इसी रेंज में हैं, लेकिन वास्तविक सर्वे रिपोर्ट्स दिखाते हैं कि 43% डिलिवरी वर्कर्स 10,000 रुपये से कम मासिक कमाते हैं, खासकर मीडियम-स्किल्ड कैटेगरी में जहां ड्राइवर्स और डिलिवरी एजेंट्स शामिल हैं।
सर्वे में अल्गोरिदमिक बायस को बड़ा मुद्दा बताया गया है, जहां प्लेटफॉर्म्स के सिस्टम कुछ वर्कर्स को ज्यादा ऑर्डर देते हैं जबकि अन्य को कम, जिससे आय में असमानता बढ़ती है। उदाहरण के तौर पर, Blinkit और Zepto जैसे क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर 10-मिनट डिलिवरी प्रॉमिस ने वर्कर्स पर दबाव बढ़ाया है, लेकिन सरकार ने हाल ही में इस टाइमलाइन को ड्रॉप करने का निर्देश दिया है। न्यू ईयर ईव 2025 पर 2 लाख से अधिक गिग वर्कर्स की स्ट्राइक ने इस मुद्दे को हाईलाइट किया, जहां बेहतर पे, सेफ्टी प्रोटेक्शन और सोशल सिक्योरिटी की मांग की गई थी।
गिग इकोनॉमी की ग्रोथ स्मार्टफोन यूज और डिजिटल पेमेंट्स से जुड़ी है, लेकिन सर्वे चेतावनी देता है कि बिना न्यूनतम वेज पॉलिसी के यह सेक्टर असंतुलित रहेगा। सिफारिश की गई है कि प्रति घंटा या प्रति टास्क मिनिमम अर्निंग्स सेट की जाएं, जिसमें वेटिंग टाइम भी शामिल हो। इससे रेगुलर एंप्लॉयमेंट और गिग वर्क के बीच कॉस्ट गैप कम होगा, क्योंकि फिलहाल प्लेटफॉर्म्स मैंडेटरी बेनिफिट्स से बचने के लिए इंसेंटिव्स पर निर्भर हैं। क्रेडिट एक्सेस भी एक समस्या है, क्योंकि आय की वोलेटिलिटी से गिग वर्कर्स को लोन मिलना मुश्किल होता है।
गिग वर्कर्स की आय संरचना: एक तुलनात्मक टेबल
| प्लेटफॉर्म | औसत प्रति ऑर्डर बेस पे (रुपये) | औसत प्रति घंटा अर्निंग (2025) | मासिक ग्रॉस (10 घंटे/दिन, 26 दिन) | नेट इनकम (फ्यूल/मेंटेनेंस काटकर) | सर्वे में कम कमाने वाले % (15,000 से कम) |
|---|---|---|---|---|---|
| Zomato | 20-50 (दूरी पर निर्भर) | 102 | 26,500 | 21,000 | 40% |
| Swiggy | 15-60 (पीक ऑवर्स में अधिक) | 98-105 | 25,500-27,700 | 20,400-22,160 | 38-42% |
| Blinkit | 15-40 (क्विक डिलिवरी) | 95 | 24,700 | 19,760 | 45% |
| Zepto | 20-45 | 100 | 26,000 | 20,800 | 41% |
इस टेबल से साफ है कि दावों के बावजूद, वर्कर्स की वास्तविक आय इंसेंटिव्स पर टिकी है, जो पीक ऑवर्स में ही उपलब्ध होते हैं। सर्वे में पाया गया कि गिग वर्कर्स का ऐट्रिशन रेट 65% है, मतलब साल में 65% वर्कर्स प्लेटफॉर्म छोड़ देते हैं, क्योंकि यह परमानेंट जॉब नहीं बल्कि टेम्पररी ऑप्शन है। औसतन, एक Zomato पार्टनर साल में सिर्फ 38 दिन काम करता है, 7 घंटे प्रतिदिन, जो कुल आय को और कम करता है।
प्रमुख चुनौतियां और सिफारिशें
इनकम वोलेटिलिटी: सर्वे के अनुसार, ऑर्डर वॉल्यूम में उतार-चढ़ाव से मासिक आय 30-50% तक घट-बढ़ सकती है। उदाहरण: रेन सीजन में डिलिवरी टाइम बढ़ने से पेनल्टी लगती है, जो बेस पे से कट जाती है।
बर्नआउट रिस्क्स: लंबे घंटे और फास्ट डिलिवरी प्रेशर से मेंटल और फिजिकल हेल्थ प्रभावित होती है। सर्वे सुझाव देता है कि पॉलिसी में हेल्थ इंश्योरेंस और सेफ्टी नेट्स शामिल किए जाएं।
क्रेडिट गैप्स: अस्थिर आय से बैंक लोन नहीं मिलते। सिफारिश: गिग वर्कर्स के लिए स्पेशल क्रेडिट स्कीम्स, जहां प्लेटफॉर्म डेटा शेयर करे।
अल्गोरिदमिक कंट्रोल: प्लेटफॉर्म्स के ऐल्गोरिदम रेटिंग्स पर आधारित ऑर्डर देते हैं, जो बायस्ड हो सकते हैं। सुझाव: ट्रांसपेरेंट सिस्टम और मिनिमम अर्निंग गारंटी।
डेमोग्राफिक्स: गिग वर्कर्स में 47% मीडियम-स्किल्ड (डिलिवरी एजेंट्स), 31% लो-स्किल्ड हैं। एजुकेशन लेवल कम होने से स्किल मिसमैच होता है, जिससे रेगुलर जॉब्स में शिफ्ट मुश्किल।
पॉलिसी रिफॉर्म्स: न्यूनतम वेज नॉर्म्स लागू करने से प्लेटफॉर्म्स को 1-2% टर्नओवर वेलफेयर फंड में योगदान देना होगा, जो इंश्योरेंस और सोशल सिक्योरिटी के लिए इस्तेमाल होगा।
सर्वे में यह भी उल्लेख है कि गिग सेक्टर की ग्रोथ 55% रही है, लेकिन वर्कर्स की सेफ्टी और फाइनेंशियल स्टेबिलिटी पर फोकस न होने से असंतोष बढ़ रहा है। हाल की स्ट्राइक में डिमांड्स जैसे हायर बेस पे और नो पेनल्टी फॉर वेदर कंडीशंस को ध्यान में रखते हुए, सरकार नए लेबर कोड्स लागू करने वाली है, जिसमें 90 दिनों से अधिक काम करने वाले गिग वर्कर्स को इंश्योरेंस कवरेज मिलेगा। इससे Swiggy और Zomato जैसे प्लेटफॉर्म्स पर दबाव बढ़ेगा, क्योंकि वे फिलहाल इंसेंटिव्स से बेनिफिट्स अवॉइड करते हैं।
गिग इकोनॉमी के आंकड़े: की पॉइंट्स
कुल गिग वर्कर्स: 1.2 करोड़ (FY25), 2030 तक 2.4 करोड़ होने का अनुमान।
सेक्टर कंट्रीब्यूशन: GDP में 1.5% से अधिक, लेकिन वर्कर्स की औसत आय स्टैग्नेंट।
स्ट्राइक इम्पैक्ट: न्यू ईयर ईव पर ऑर्डर्स में 20-30% गिरावट, प्लेटफॉर्म्स ने पीक इनसेंटिव्स बढ़ाए।
कम्पैरिजन विद रेगुलर जॉब्स: गिग में कोई फिक्स्ड सैलरी नहीं, जबकि अनऑर्गनाइज्ड सेक्टर में भी मिनिमम वेज 15,000-20,000 रुपये है।
फ्यूचर ट्रेंड्स: टेक गिग इकोनॉमी बढ़ रही है, लेकिन डिलिवरी सेक्टर में रेगुलेशन से कॉस्ट बढ़ सकता है, जो कंज्यूमर प्राइस पर असर डालेगा।
यह सर्वे गिग वर्कर्स के लिए एक वेक-अप कॉल है, जहां प्लेटफॉर्म्स के प्रॉफिट्स वर्कर्स की प्रोटेक्शंस से ऊपर नहीं होने चाहिए। पॉलिसी चेंजेस से सेक्टर बैलेंस्ड हो सकता है, लेकिन फिलहाल दावों और हकीकत में बड़ा गैप है।
Disclaimer: यह लेख समाचार रिपोर्ट, टिप्स और विभिन्न स्रोतों पर आधारित है।